Thursday, 20 August 2020

वियोग

         


ऐ हवा! जरा रुक, ठहर, ले चल अपना बना के साथिया 

जब से महबूब ने छोड़ी है ये गलियां ,

सबके साथ में भी अकेला सा लगता है ये जग दुनिया ||

ऐ हवा! जरा रुक ,ठहर ,ले चल अपना बना के साथिया 


पहले महीने भी सप्ताह जैसे लगते थे ,इन दिन रातों की कौन बात करें |

अब सेकंड भी ऐसे लगती हैं जैसे गुजारनी हो सातों समुद्र की दूरियां ||

ऐ हवा! जरा रुक, ठहर , ले...,

हमने तो सुना था कि यदि दिल से चाहो तो भगवान भी मिल जाते हैं ,|

इसी युग में सूरदास को बचाने के लिए श्री कृष्ण भी आ जाते हैं,

कहां रही खामियां ,की मिटी नहीं ये दूरियां ||

ऐ हवा! जरा रुक ,ठहर ले चल अपना बनाके साथिया 


क्या करे अब नफरत भी नहीं होती उनसे से और भूल भी नहीं सकते उसको, |

कुछ तो रही होगी मजबूरियां, जो गुजरी नहीं उसके साथ गुजरिया||

ऐ हवा! जरा रुक, ठहर ले चल अपना बनाके साथिया ||




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