ऐ हवा! जरा रुक, ठहर, ले चल अपना बना के साथिया
जब से महबूब ने छोड़ी है ये गलियां ,
सबके साथ में भी अकेला सा लगता है ये जग दुनिया ||
ऐ हवा! जरा रुक ,ठहर ,ले चल अपना बना के साथिया
पहले महीने भी सप्ताह जैसे लगते थे ,इन दिन रातों की कौन बात करें |
अब सेकंड भी ऐसे लगती हैं जैसे गुजारनी हो सातों समुद्र की दूरियां ||
ऐ हवा! जरा रुक, ठहर , ले...,
हमने तो सुना था कि यदि दिल से चाहो तो भगवान भी मिल जाते हैं ,|
इसी युग में सूरदास को बचाने के लिए श्री कृष्ण भी आ जाते हैं,
कहां रही खामियां ,की मिटी नहीं ये दूरियां ||
ऐ हवा! जरा रुक ,ठहर ले चल अपना बनाके साथिया
क्या करे अब नफरत भी नहीं होती उनसे से और भूल भी नहीं सकते उसको, |
कुछ तो रही होगी मजबूरियां, जो गुजरी नहीं उसके साथ गुजरिया||
ऐ हवा! जरा रुक, ठहर ले चल अपना बनाके साथिया ||


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